Tuesday, April 17, 2018

Lalita's Story: Pakistani 'Hindus' are Kafir of course, but their young women are a different matter

Lalita was a young college girl in Karachi (Sindh) when she was abducted at gunpoint by Salman and his Islamist friends, writes Dr. Shershah Syed in an Urdu piece published in HumSub online magazine on 13 April 2018.

She was then forced to ‘convert’ to Islam and ‘marry’ Salman while friendly Mullahs and their lawyers worked overtime to ward off the legal consequences of their crime and to try to ensure that the young woman is prevented from meeting her family ever again.

After her forced ‘marriage’, Lalita is made to give birth to a child even as the womenfolk of her captor’s household think of her as someone who had slyly ensnared their son and brother, writes Dr. Syed who is a well known obstetrician and gynaecologist of Pakistan.

Dr. Syed is the president of the Pakistan National Forum on Women’s Health (PNFWH) which is known for its work on women’s reproductive health and rights.

He has written 10 books, the latest being a collection of short stories.

He is based in Karachi in Sindh province which houses most of Pakistan’s ‘Hindus’ and also accounts for most of the cases of ‘forced conversions’ to Islam, especially of young women, including minors.

A Dawn report of Nov. 2016 cites a study (published in July 2015) that said, “At least 1,000 girls are forcibly converted to Islam in Pakistan every year.”

In Feb. 2018, The Express Tribune said: “Every year, hundreds of Hindu girls are forcibly converted to Islam after being kidnapped by unidentified persons usually with the connivance of the local police.”

Daily Times said in Sep. 2017: “Religious institutions are pivotal in promoting” Hindu girls’ “sham conversions to Islam”.

I have translated Lalita’s story from Urdu to Hindi in a way that most of the original wording has been retained.

Here is the story.
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http://www.humsub.com.pk/122461/shershah-syed/

आशिक़ नौजवान, हिन्दू लड़की, गुमराह मौलवी और मजबूर बाप 

(डॉ. शेरशाह सय्यद, 13 अप्रैल 2018, ‘हमसब’ मैगज़ीन, पाकिस्तान)

“मुझे फांसी मिल जाती तो अच्छा था.” उसने बड़े दुःख से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा था. 

उसके लहजे में दर्द और उसकी आँखों में उदासी थी -- ऐसी कि जिसे देख कर देखने वाला भी उदास हो जाए.

वो अपने बाप के साथ आया था, जो मुझे सीधे-सादे से आदमी लगे -- दुबले पतले, सर पर जाली वाली सफ़ेद टोपी, तराशी हुई दाढ़ी, और आँखों पर क़ीमती फ़्रेम वाला ऐनक।

मुझे डॉक्टर हमीद ने फ़ोन करके उनके बारे में बताया था और कहा था कि वो उसे लेकर आएंगे।

हमीद का शुमार शहर के उन गिने-चुने डॉक्टरों में होता था जो न सिर्फ़ इलाज करते हैं बल्कि मरीज़ और मरीज़ के ख़ानदान के साथ क़रीब के ताल्लुक़ात भी रखते हैं। 

पूरा ख़ानदान हमीद का मरीज़ था. खाते-पीते लोग थे; कराची की सब्ज़ी मंडी में आढ़ती का काम करते थे.

सलमान ने किसी हिन्दू लड़की का अपहरण किया था. उस से शादी की थी, जिस के बाद एक बच्ची भी पैदा हुई. वह हिन्दू लड़की एक दिन भाग गई थी. 

मैंने क़िस्सा तो सुन लिया था लेकिन मेरा ख़याल था कि मैं मरीज़ और उसके ख़ानदान की ज़बान से ही सारी बातें दोबारा सुनूँ तो बेहतर होगा।

मुझे अंदाज़ा हो गया था कि पूरा ख़ानदान किस क़िस्म के ज़बरदस्त दबाव का शिकार होगा.    

वे सब ही दबाव के शिकार थे. उन दोनों को बुलाने से पहले मैं उसके बाप को बुला कर उनकी बातें सुन चुका था. उन्होंने मुझे बताया कि वो कई दफ़ा ख़ुदकशी करने की कोशिश कर चुका है. अब उसे हर वक़्त किसी न किसी की निगरानी में रखना पड़ता है. 

घर में भी उस पर नज़र रखनी पड़ती है कि कहीं वह बावर्ची-ख़ाने से छुरी निकाल कर अपने आप पर वार न कर डाले।  

कमरों के दरवाज़ों की चिटखनियां निकाल दे गई हैं कि कहीं वो किसी कमरे में बंद होकर अपने आप को फांसी न लगा ले। 

हर वक़्त उस के साथ एक मुलाज़िम रहता है.

इकलौता बेटा और उस का ये हश्र; किसी ने सोचा भी न था. माँ और बहनें हर वक़्त आँसू बहाती रहती हैं. 

“न जाने किस की बद-दुआ या नज़र लगी है कि यह सब कुछ हो गया हमारे साथ.” उन्होंने बड़े दर्द भरे अलफ़ाज़ में पूरी कहानी सुनाई थी.

वे पूर्वी पाकिस्तान से लुटे-पुटे कराची आए थे. पूर्वी पाकिस्तान में अच्छा कारोबार था. बिहार से वे लोग पश्चिमी पाकिस्तान के बजाए ढाका चले आए थे. वहाँ ही उनके बाप ने मेहनत की और आहिस्ता आहिस्ता कारोबार जमाया था. 

छोटी उम्र से वो अपने पिता के साथ उन का हाथ बटाने लगे थे. देखते ही देखते उन्होंने वो सब कुछ हासिल कर लिया था जिसकी हर आदमी कोशिश करता है. 

"पूर्वी पाकिस्तान में सब कुछ मिला था हम लोगों को. बड़ी मेहनत की थी हमारे ख़ानदान ने. सुबह से शाम तक काम करते थे और अल्लाह ने उस का फल भी दिया। अच्छे पैसे कमाए। दोस्त, अज़ीज़, रिश्तेदार सब की मदद भी की. मकान भी बनाया। सोचा भी न था कि रुत ऐसे बदलेगी कि सब कुछ ख़त्म हो जाएगा।"

बांग्लादेश तो एक बड़ा देश बना मगर न जाने कितने छोटे छूटे 'देश' तबाह हो गए. बच्चे यतीम हो गए, बीवियाँ बेवा हो गईं, और अपने जवान बच्चों की मौत का मातम करते हुए माएँ अपना आपा खो बैठीं। 

बहनें भाइयों को याद करती हैं और भाई अपनी बिछड़ी हुई बहनों के बारे में डरावने ख़्वाब देख देख कर न जाने कैसे ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. 

“क्यों होता है ऐसा ? कुछ सालों के बाद वही कहानी दोहराई जाती है.” उन के लहजे में पीड़ा थी.

“शुक्र है हमारे खानदान की दोनों जवान लड़कियाँ - मेरी दोनों बहनें - अग़वा नहीं हुईं बल्कि गोली का निशाना बन कर मर गईं.” 

“मैं, मेरी माँ और मेरे वालिद उनके लिए फातहा पढ़ लेते थे; उन्हें याद कर के रो लेते थे. अब मैं भी उन्हें याद करता हूँ तो यही सोचता हूँ कि वे कहीं जन्नत में सुकून से रह रही होंगी। मैं उनके बारे में सोच सोच कर परेशान नहीं होता हूँ.”

मुझे इस तरह की कहानियाँ सुनने का शौक़ था. मेरा विचार था कि मरीज़ों और मर्ज़ को समझने के लिए और उसके बाद इलाज करने के लिए ज़रूरी है कि ऐसे विवरण को इकट्ठा किया जाए; उस की छान-बीन की जाए तो बहुत सारी मनोग्रंथिओं को खोलने और समझने में मदद मिलती है. 

मानसिक रोगियों का इलाज उन गुत्थियों को खोले बिना संभव नहीं है.  

मेरा ध्यान अपनी ओर पाकर उन्होंने फिर कहना शुरू किया था कि जो कुछ भी हुआ दोनों तरफ़ से हुआ - क्या बिहारी, क्या बंगाली, क्या फ़ौजी, और क्या मुक्ति-बाहिनी। कोई भी इंसान नहीं रहा था. 

"वहशत, दहशत, दरिंदगी और ज़ुल्म के दर्जे नहीं होते हैं, डॉक्टर साहब, जैसे चोरी और बेईमानी के दर्जे नहीं होते हैं. चोर को जानते-बूझते हुए चोर न समझना, बेईमान की बेईमानी की हिमायत करना, चोरी और बेईमानी से ज़्यादा बड़े जुर्म हैं.”

“जुर्म चाहे बड़ा हो या छोटा, जुर्म तो जुर्म ही होता है. इसी तरह से ज़ुल्मो सितम, वहशत, दहशत, दरिंदगी की हिमायत किसी भी वजह से की जाए वह भी वहशत, दहशत, दरिंदगी ही कहलाएगी।"

"न जाने क्या हो गया था लोगों को. पाकिस्तान को बचाने के लिए एक भी बंगाली का क़त्ल नहीं होना चाहिए था और बँगलादेश बनाने के लिए एक भी बिहारी को मारना नहीं चाहिए था."

"काश किसी लड़की की इज़्ज़त न लूटी जाती; काश किसी को भी क़त्ल नहीं किया जाता। क्या ज़रुरत थी इन सब चीज़ों की?"

उन की बात में वज़न तो बहुत था मगर हक़ीक़ी दुनिया में तो ऐसा नहीं होता है. 

लोग वर्चस्व के लिए लड़ेंगे, क़ौमें एक दूसरे का गला काटेंगी, एक दूसरे की माँओं बहनों की इज़्ज़त लूटेंगी। कभी क़ौमियत के नाम पर, कभी मज़हब के नाम पर, कभी मुल्क बचाने के लिए, और कभी अपने अहं की संतुष्टि के लिए. 

इंसान तो यही करते रहे हैं. इतिहास तो यही बताता है. मेरे मन में भी इस क़िस्म के विचार आते रहते थे. 

“दो बहनों का दुःख ले कर और सब कुछ ढाका में छोड़ कर मैं अपने परिवार के साथ नेपाल के रास्ते कराची पहुँच गया था और कराची के औरंगी टाउन में ज़िंदगी वैसे ही शुरू कर दी थी जैसे मेरे बाप ने ढाका में शुरू की थी. वहाँ मैं उन का हाथ बटाता था; यहाँ उन्होंने मेरा हाथ बटाया। यहाँ बहुत जल्द अल्लाह की महरबानी से हम लोगों को सब कुछ मिल गया.”

“मैंने वही काम यहाँ की सब्ज़ी मंडी में शुरू कर दिया. यही एक काम मुझे आता था जो मैं अच्छे तरीक़े से कर सकता था. फिर औरंगी टाउन छोड़ कर गुलशन इक़बाल जा बसने में बहुत देर नहीं लगी हमें.”

“मैंने अपनी बेटियों और बेटे को पढ़ने में लगा दिया था. बहुत मेहनत की थी उनकी माँ ने उनके पीछे.” 

“बांग्लादेश में सब कुछ उलट गया था हमारा और हमारे जैसे लोगों का. मैं शायद क़िस्मत का धनी था. शायद मेरी क़त्ल होने वाली बहनों की दुआएं थीं मेरे साथ कि मेहनत करने का मौक़ा मिल गया और मेहनत से खोई दौलत भी वापिस आ गई.” 

“मगर कई ख़ानदान तो ऐसे तबाह हुए कि आज तक उस तबाही से बाहर नहीं निकल सके हैं.” 

“मैने सोचा था कि मैं अपने बच्चों को पढ़ाऊँगा - इतना पढ़ाऊँगा कि कल अगर दोबारा वही सब कुछ पाकिस्तान में हुआ जो बांग्लादेश में हुआ था तो उन्हें संभलने के लिए वह सब कुछ नहीं करना पड़े जो मुझे करना पड़ा है.”

“सेठ तो कंगाल हो सकता है, मगर पढ़ा लिखा आदमी कंगाल नहीं होता है.” 

ये कह कर वो ख़ामोश हो गए, जैसे कुछ कहने के लिए सही अल्फ़ाज़ का चुनाव करना चाह रहे हैं. 

फिर मेरे कुछ कहने से पहले ही उन्होंने दोबारा कहना शुरू किया.

"शायद मुझ से ग़लती हो गई. तालीम के बावजूद जो कुछ हुआ वो मैंने सोचा भी नहीं था. ये मेरा बेटा बिलकुल ठीक-ठाक था. इसे मैंने कारोबार भी सिखाया और तालीम भी दिलाई। ये काम भी सही करता था, मगर न जाने क्यों और कैसे ये सब कुछ हो गया हमारे साथ."

उन की आँखें झिलमिला गईं और आवाज़ भर्रा गई.

“मेरा बेटा एक शरीफ़ आदमी था. मेरी आँखों के सामने बड़ा हुआ था. ज़ाहिर में कोई ख़राबी नहीं थी उसमें। मेहनती था, काम करता था. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में पढ़ा था।“

“इलाक़े के मस्जिद में नमाज़ पढ़ता था, रोज़े रखता था. सारे दोस्त उसके मज़हबी थे.”

“मैं आज तक नहीं समझ सका कि उसे ऐसा करने की क्या ज़रुरत थी. कोई ज़रुरत नहीं थी. ख़ानदान में, ख़ानदान के बाहर, दोस्तों में, रिश्तेदारों में, ख़ुद हमारे मोहल्ले में बहुत सारी ख़ूबसूरत लड़कियां थीं.”

“हम लोग खाते पीते लोग थे; कुछ कमी नहीं थी. जिससे चाहता उससे शादी हो जाती उसकी, मगर वो एक हिन्दू लड़की पर आशिक़ हो गया.”

“मैंने, उसकी माँ ने, उसकी बहनों ने, किसी ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो जाएगा और इस तरह से हो जाएगा।"

“शुरू में तो मैंने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। ऐसा हो जाता है; आप किसी को पसंद कर लेते हैं. चाहते हैं कि उससे आपकी शादी हो जाए, वो आपको मिल जाए. मगर ज़िंदगी में वो सब कुछ तो नहीं होता है जो आप चाहते हैं."

फिर आप सब्र कर लेते हैं. भूल जाते हैं. ख़ास तौर पर ऐसे हालात में जब सारी मुहब्बत एकतरफ़ा हो, जब मज़हब, ज़ात, फ़िरक़े का फ़र्क़ हो.” 

"एक दिन मैंने उसे समझाया था कि हम लोग मुसलमान हैं और वो एक शरीफ़ हिन्दू घराने की शरीफ़ सी हिन्दू लड़की है जो तुम से शादी करना भी चाहे तो नहीं कर सकती है क्योंकि उसके माँ-बाप कभी भी राज़ी नहीं होंगे।"

“फिर सबसे बड़ी बात ये थी कि ललिता ने तुमसे साफ़ साफ़ कह दिया है कि उसे तुममें कोई दिलचस्पी नहीं है. फिर तुम ऐसी ज़िद क्यों कर रहे हो जिसका कोई फ़ायदा नहीं है. मैंने और इसकी माँ ने बहुत समझाया था इसे. इसकी माँ तो रो दी थी इस के सामने।“

"'मैं उसे मुसलमान बनाऊँगा। वो मेरी बीवी बनेगी। मैं उसके बिना नहीं रह सकता हूँ.' - इसने बार-बार अपनी माँ से यही कहा था. ये समझना ही नहीं चाह रहा था कि ललिता और ललिता के ख़ानदान को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. 

"वे हिन्दू लोग थे और हिन्दू रह कर अपने ही तरीक़े से ज़िंदगी गुज़ारना चाहते थे. वे लोग कराची के पुराने सिंधी थे. खाते पीते, ख़ुशहाल व्यापारी, और अपने काम से काम रखने वाले लोग."

“बेशक वो एक ख़ूबसूरत लड़की थी. मेरे बेटे को अच्छी लगी होगी। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं था कि ये उसका अपहरण कर लेता। हाँ डाक्टर साहब, इसने उसे अग़वा कर लिया अपने दोस्तों की मदद से. इसने उसे कॉलेज से घर आते हुए ज़बरदस्ती रास्ते में पकड़ कर अपनी गाड़ी में डाल कर अग़वा कर लिया था.” 

"मुझे बाद में पता चला कि इसने पैसे ख़र्च किए थे उसके अपहरण पर. वो चीख़ी, चिल्लाई थी, मगर हथियारों के ज़ोर पर वो सब कुछ हो गया जो कराची में होता रहता है, जो सिंध के छोटे बड़े शहरों, क़स्बों में हो रहा है."

"हर कोई देख रहा है, समझ रहा है; फिर भी हम सब देखते रहते हैं, कुछ नहीं कहते। क्योंकि हममें न तो नैतिक साहस है, न जुरअत है, और शायद इसे बुरा भी नहीं समझते हैं - उस वक़्त तक जब तक ये हमारे अपने साथ नहीं हो जाता."

“कुछ न कहना, कुछ नहीं करना, एक तरह से हिमायत ही तो है इस अत्याचार की.” 

मैंने नहीं सोचा था कि कहानी इतनी पेचीदा होगी और मौलवी टाइप का ये आदमी इस तरह की बात करेगा।

कोई भी अपने बेटे को बुरा नहीं कहता है, बुरा नहीं समझता है, ख़ास तौर पर ऐसे मामले में जब मज़हब का नाम लिया जाता है, जब मामला हिन्दू मुसलमान के दरम्यान का है. मुसलमान कैसे ग़लत हो सकता है? ये तो मुमकिन ही नहीं था.

"मुझे तो बहुत बाद में पता चला जब ललिता के बाप की तस्वीर अख़बार में छपी थी. उस का ब्यान था कि उसकी बेटी को अग़वा कर लिया गया है. मेरे बेटे का नाम था कि इसने अग़वा किया है और उसे मुसलमान बनाकर उससे शादी कर ली है."

"ये सब कुछ एक आलिम (इस्लाम पढ़ा हुआ व्यक्ति) के हाथों हुआ था बड़े सुनियोजित तरीक़े से. एक बड़े से मदरसे में ये जिहाद किया गया था एक निहत्थी, मासूम, छोटी उम्र की हिन्दू लड़की के ख़िलाफ़।"

“मेरा बेटा इतना घटिया हो जाएगा, ये मेरी कल्पना में भी नहीं था.”

छः महीने तक कुछ भी नहीं हुआ - ललिता का बाप पुलिस स्टेशन और बड़े अफ़सरों के दफ़्तरों के चक्कर काटता रहा.

"प्रेस क्लब में 'हिन्दू पंचायत' वाले प्रेस कांफ्रेंस करते रहे. कुछ भी नहीं हुआ. मेरे बेटे और उस मौलवी का वकील बहुत बड़ा वकील था. इसकी गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत पर ज़मानत होती रही."

"वकील ने कुछ ऐसा चक्कर डाल दिया था कि पुलिस वाले जानते बूझते हुए भी ललिता को वापिस नहीं ला सकते थे."

"ये दोनों एक 'सुरक्षित' जगह पर रह रहे थे. ये कैसा सिस्टम है जिस में मज़हबी बुनियाद पर बेबस लड़की अग़वा हो जाती है, रुपयों से ख़रीदा हुआ वकील क़ानून से खेलता है, और जज इंसाफ़ मुहय्या करने में बेबस है." 

"मैंने इसे समझाने की कोशिश की थी, मगर ये नहीं समझा। मैं तो एक बाप हूँ; मेरी बेटियाँ भी हैं. मुझे अंदाज़ा था कि ललिता के बाप पर क्या गुज़र रही होगी। उस की माँ कैसे सोती होगी, कैसे खाती होगी, कैसे रोती होगी।
मैं सोचता था और मुझे भी नींद नहीं आती थी; ज़िन्दगी का मज़ा ख़त्म हो गया था."

"साल नहीं गुज़रा था कि एक दिन ये ललिता को लेकर घर आ गया; इसके साथ पुलिस थी, मौलवी टाइप गार्ड थे. कुछ मौलवी थे. ये सब अदालत से आए थे. ललिता ने जज के सामने इक़रार किया था कि वो मुसलमान हो गई है; वो अपने शौहर के साथ अपनी मर्ज़ी से अदालत आई है, और अपने माँ-बाप के पास वापिस नहीं जाना चाहती है."

"मौलवियों ने फ़तवा दिया था कि ललिता - जिस का नाम 'फ़ातमा' रखा गया - अब अपने काफ़िर माँ-बाप से नहीं मिल सकती है क्योंकि वे उसके लिए 'ना-महरम' हैं." ('ना-महरम': जिससे, इस्लामी क़ानून के अनुसार, नज़दीकियां निषिद्ध हैं और पर्दा करना उचित है.) 

"मैंने उसे बख़ुशी क़ुबूल कर लिया था. वो छः महीने की गर्भवती थी; वो मेरे बेटे के बच्चे की माँ बनने जा रही थी. मेरी बीवी और मेरी बेटियों ने भी उसे क़ुबूल कर लिया था, गो कि दिल से वे यही समझती थीं की ललिता ने सलमान को फंसाया है और उसे पागल कर दिया है."

"मैं बिल्कुल भी ऐसा नहीं समझता था. मेरा दिल कहता था कि उसके साथ मेरे बेटे और उस के दोस्तों ने ज़्यादती की है. मैं उसकी मदद करना चाहता था.”

"मैंने उसकी आँखों में ख़ौफ़ के साये देखे थे. वो नाज़ुक और बहुत ख़ूबसूरत लड़की थी. बहुत कम वक़्त में उसके साथ बहुत कुछ हो गया था." 

"मेरे बेटे ने न जाने कैसे बहुत बड़ा जुर्म और ज़ुल्म किया था. उसे अग़वा किया था, ज़बरदस्ती उसे अपने माँ-बाप से जुदा कर दिया था, उसे मजबूर करके उसका मज़हब तब्दील कराया था, उससे ज़बरदस्ती शादी करली थी."

"ये बातें समझने के लिए बहुत तालीम और समझ की ज़रुरत नहीं है. उसकी बड़ी, स्याह आँखों में ख़ौफ़ की कैफ़ियत सब कुछ बता रही थी."

"मुझे अंदाज़ा हो गया कि उसने डरावे में अदालत में बयान दिया था ताकि वो उस पनाह-गाह से निकल सके. वो गर्भ से ज़रूर थी मगर मुझे पता था कि उसका बलात्कार हुआ है. न वो मुसलमान हुई है, न उसे मेरे बेटे से मुहब्बत है, और न ही वो माँ बनना चाहती है."

"वो हैरान-परेशान थी; डरी हुई थी; उसके साथ जो कुछ भी हुआ था वो माफ़ी के भी क़ाबिल नहीं था."

"मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरा बेटा, मेरा ख़ून, ये सब कुछ करेगा, डॉक्टर साहब।"

मैंने बहुत कम ऐसे बाप देखें हैं जो अपनी औलाद के जुर्म का बोझ उठाते हैं. मैं ध्यान से उनकी बात सुन रहा था और सलमान की फ़ाइल पर लिखता भी जा रहा था. 

"वो बड़ी भोली सी लड़की थी - सलमान से ख़ौफ़ज़दा। उसे देखते ही मेरी आँखों में आँसू झलक आते थे. मैं अपनी उन दो बहनों के बारे में सोचता था जो बांग्लादेश में क़त्ल हो गई थीं. उन बेटियों के बारे में सोचता जो कॉलेज में पढ़ रही थीं कि अगर उनके साथ यही सब कुछ हो जो ललिता के साथ हुआ है तो क्या होगा।"  

"मेरी बेचैनी का अंदाज़ा सलमान नहीं कर सकता था. वो खुश था कि ललिता उसके क़ब्ज़े में थी. उसे अपने मज़हबी दोस्तों की हिमायत हासिल थी. उसका ख़याल था कि उसने ललिता को मुसलमान करके जन्नत कमा ली है. उसके मौलवी रहनुमा और दोस्तों का यही ख़याल था."

"जल्द ही मैं दादा बन गया. नन्ही सी बच्ची - जिसे उसने कोमल का नाम दिया था - को देख कर झूम उठता. उसे चूम कर मुझे उसके नाना का ख़याल आता और फिर मेरा दिल भर आता."

"डाक्टर साहब, आप अंदाज़ा नहीं कर सकते कि मेरे दिल पर क्या गुज़री थी. मैं कुछ नहीं कर सकता था सिवाए दुआओं के. उस दिन अशा की नमाज़ पर मैंने दुआ की थी कि मेरे बेटे को हिदायत मिले। वो ये सब कुछ न करे जो वो कर रहा था." 

"(पर) मैं कुछ भी नहीं कर सका। न उसे बदल सका, न उसके दोस्तों को बदल सका."  

"एक दिन मेरे दफ़्तर ललिता के वालिद आ गए. बिमल कुमार नाम था उनका. पचास से ज़्यादा उम्र नहीं होगी उनकी, मगर वक़्त ने बूढ़ा कर दिया था उन्हें। उन्हें नहीं पता था कि ललिता माँ बन गई है. वो तो सिर्फ़ ये कहने आया था कि वो जो हुआ उसे नहीं बदल सकता, मगर वो चाहता है कि वो और उस की बीवी ललिता से मिल सकें।"

"मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर के अपना दिल उसके सामने खोल कर रख दिया। मैंने उसे कहा कि मैं सलमान का बाप ज़रूर हूँ, मगर उसका तरफ़दार नहीं हूँ. मैंने उससे माफ़ी मांगी कि मैं कुछ कर नहीं सका. सलमान ने जो भी कुछ किया वो ग़लत था और अब जो भी कुछ हो रहा है सही नहीं है. मुझे अपनी मजबूरी पर रोना आया था."  

"उसने मेरे हाथ थाम कर कहा कि वो समझ सकता है कि मेरा कोई दोष नहीं है. 'बस आप उसे ये कह दें कि हम उसे भूले नहीं हैं. उसकी माँ, उसकी बहन, उसका भाई, उसकी नानी, उसकी दादी, सब उसके लिए रोते हैं. रोते रहेंगे। वो जहां भी है हमारी बेटी है, हमारी बेटी ही रहेगी'।"

"मैं ललिता को बताना चाहता था कि उसका बाप मुझसे मिला है. मैं मौक़े की तलाश में था कि कब मुझे फ़ुर्सत और ऐसा वक़्त मिल जाएगा कि मैं उससे अकेले में बात कर सकूं।"

"सलमान की कड़ी नज़र थी उसकी तरफ़ और मुझे कई बार संदिग्ध लोग मकान के आस-पास नज़र आते थे. ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने वालों ने हमारे मकान पर नज़र रखी हुई थी. मैं चाहते हुए भी उसकी मदद नहीं कर पा रहा था."

"मैं दिल से चाहता था कि वो वापिस अपने माँ-बाप के पास चली जाए. दीन, ऐतक़ाद और मज़हब में ज़बरदस्ती नहीं होती। अग़वा करके शादी करना किसी भी मज़हब में जायज़ नहीं हो सकता।"

"मुझे अफ़सोस इस बात का भी है कि इसकी माँ भी इसकी हामी हो गई थी. ममता अपनी जगह पर सही है, लेकिन मेरी समझ में नहीं आता था कि ये कैसी ममता है जो अपने बेटे के लिए हर बात जायज़ समझती है."

"मैं सोचता हूँ, डाक्टर साहब, कि हम लोगों में कोई बहुत बड़ी बुनियादी ख़राबी है. पहले तो वो इस बात के ही ख़िलाफ़ थी कि सलमान किसी हिन्दू लड़की से शादी करे. और अब वो न सिर्फ़ उस अपहरण को भी जायज़ समझती थी बल्कि इस मामले पर बात करने को भी तैयार नहीं थी."  

"मैं ये अच्छी तरह से समझ रहा था ललिता न मुसलमान हुई है और न ही सलमान को अपना शौहर समझती है. वो एक मुसलमान, एक बीवी की ऐक्टिंग  कर रही थी. उसने अपने ख़ानदान को बचाने के लिए अपने आप को क़ुर्बान कर दिया था. मैं उसकी डरी हुई आँखों में पढ़ रहा था कि वो सिर्फ़ मौक़े के इंतिज़ार में है."

"मैं उसकी मदद करना चाहता था क्योंकि उसकी ज़िंदगी और उसकी बहाली में ही हम सब की बहाली थी. मुझे पता था कि सलमान भी ये समझता है कि ललिता को हासिल करके भी वो उसे हासिल नहीं कर सका है."

"यही वजह थी कि उसका रवैया आक्रामक हो गया था. वो अपने तंग-नज़र मज़हबी दोस्तों और रहनुमाओं के साथ रह कर बदल गया था. अपने आप को ही सही समझता और अपने अहं की संतुष्टि के लिए कुछ भी कर गुज़रता। इससे बड़ी और ख़राब बीमारी कोई नहीं है."

"न जाने क्यों उस रात कैसे मेरी आँख खुल गई थी. मैं अपने कमरे से उठकर फ्रिज से पानी लेने के लिए जा रहा था कि मैंने ललिता को देखा। वो बच्ची को हाथों में संभाले खुले हुए दरवाज़े से बाहर निकल रही थी."

"पता नहीं क्यों मैं समझ गया था कि वो घर छोड़ कर जाने की कोशिश कर रही है. मैं दबे पाँव उसके पीछे गया. मैंने पहली और आख़िरी दफ़ा उसे गले लगाया, अपनी पोती को शायद आख़िरी दफ़ा चूमा इस उम्मीद के साथ कि वो जहां रहे ख़ुश रहे।"

"ललिता ने भी मेरे हाथों को ज़ोर से पकड़ा। उसकी आँखों में आँसू थे. मुझे नहीं पता है कि मेरे घर के गेट से बाहर वो रिक्शा कैसे और कब से खड़ा था. वो तेज़ी से बच्ची को लेकर रिक्शे में बैठ गई."

"मैं गेट को बंद किए बिना ख़ामोशी से अपने कमरे में आकर लेट गया और दुआ करता रहा था कि ललिता निकल जाए; कोई उसे रोके नहीं।" 

"सुबह हुई तो घर में वही कुछ हुआ जिस की उम्मीद थी - शोर शराबा, ग़ुस्सा, और बहुत से मौलवियों की आमद. मुझे लगा कि अब एक बार फिर से क़ानूनी और मज़हबी जंग शुरू हो जाएगी।"

"मगर कुछ नहीं हुआ, सिवाए इसके कि उसी दिन ललिता के बाप के घर पर पुलिस का छापा पड़ा जिसमें कुछ भी बरामद नहीं हुआ. ललिता वहाँ नहीं थी."

"दस दिन के बाद ललिता के बाप ने थाने से अपनी शिकायत वापस ले ली और अदालतों से अपना मुक़द्दमा ख़त्म करने की दरख़्वास्त दे दी. मुझे इत्मिनान सा हो गया था कि ललिता महफ़ूज़ है."

"एक दिन ये बहुत ग़ुस्से में मेरे ऑफ़िस आ गया. इसके साथ दो और नौजवान थे. इनका बात करने का ढंग बता रहा था कि ये सब एक ही सोच रखते हैं जिसके मुताबिक़ एक हिन्दू लड़की को मुसलमान बना लेना एक मुबारक काम है."

"'हम उसे वापस ले कर आएंगे। समझा क्या है उन हिन्दुओं ने! हम मुसलमान हैं,' वग़ैरह वग़ैरह। ये सब कुछ बड़े ज़ोर ज़ोर से कहा था उन लोगों ने."

"मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की: 'वो अपनी मर्ज़ी से तुम्हें छोड़ कर गई है. वो तुम्हें अपना शौहर नहीं समझती। इस वक़्त न जाने कहाँ होगी। शायद भारत चली गई हो. जो हो गया, सही या ग़लत, उसका इलाज मुमकिन नहीं है. अब आगे बढ़ने का वक़्त है'."

"मगर ये बात उनकी समझ में नहीं आई थी. मेरा दिल जैसे बैठ गया. ये कौन लोग थे?"

"मैं मज़हबी आदमी हूँ, अल्लाह पर यक़ीन रखता हूँ, मुसलमान हूँ. मैं तो सोच भी नहीं सकता कि मैं किसी से ज़बरदस्ती करूँ और ज़बरदस्ती भी ऐसी..... मुझे पहली बार अपने बेटे को देख कर घिन आई."

"वे लोग मुझ से बेकार की बहस कर के चले गए. उसी शाम को एक आदमी बिमल कुमार का एक ख़त मेरे बेटे के नाम दे कर गया. लिफ़ाफ़ा बंद था. मैंने उसे खोलना मुनासिब नहीं समझा। घर आकर इसे अपने कमरे में बुला कर लिफ़ाफ़ा दे दिया।"

"इस ने ख़त खोला, खोल कर पढ़ा, दोबारा पढ़ा, और ज़ोर ज़ोर से रोने लगा. ख़त उसके हाथ में था."

"मैंने कुछ नहीं कहा. दिल तो मेरा चाहा कि उसे तसल्ली दूँ, मगर न जाने क्यों मैं ऐसा कर नहीं सका. शायद मेरे अंदर इसके ख़िलाफ़ ग़ुस्सा था. फिर भी मैंने उसका हाथ पकड़ लिया था."   

"आहिस्ता आहिस्ता इसकी हिचकियाँ रुक गई थीं और ये ख़ामोशी से दीवार को तक रहा था. मैंने इसके चेहरे पर नज़र डाली तो इसने बिमल कुमार का ख़त मुझे थमा दिया।"

"बेटे हमेशा ख़ुश रहो. तुम्हें मैं बताना चाहता हूँ कि ललिता हिन्दोस्तान चली गई है, जहाँ उसकी मासी ने उसका रिश्ता भी तय कर दिया है. अब वो कभी भी अपने पुरखों के देस सिंध-पाकिस्तान नहीं आएगी। उसके होने वाले शौहर और उनके परिवार ने उसे बच्ची समेत क़ुबूल कर लिया है. मैं प्रार्थना करता हूँ, तुम भी दुआ करो, कि वो हमेशा ख़ुश रहे. मैं चाहता हूँ कि तुम भी ख़ुश रहो."

"मुझे और मेरे ख़ानदान को तुमसे बड़ी शिकायत है. मेरी बीवी न जाने तुम्हारे बारे में क्या क्या कहती रहती है और न जाने कौन कौन सी बद-दुआएँ देती रहती है. मैं सिर्फ़ दुआ करता हूँ कि वक़्त के साथ उसके ज़ख़्म भर जाएँ और वो भी सब कुछ भूल जाए. मेरे घर वाले कहते हैं कि तुमने माफ़ न करने वाला जुर्म किया है; तुमने हमारे ख़ानदान का सुख चैन छीन लिया; तुमने मेरी मासूम बच्ची के साथ जो कुछ किया है माफ़ कर देने के क़ाबिल नहीं है. मैं पिछले कई महीनों से इसी बारे में सोचता रहा हूँ, रातों को जागता रहा हूँ, लेकिन मैंने अपनी बीवी बच्चों को कह दिया है कि मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है."

"मेरे ख़याल में माफ़ करना तो वही होता है जब नाक़ाबिले माफ़ी को भी माफ़ कर दिया जाए."
-बिमल राय

"ख़त मेरे हाथों में कपकपाने लगा. मेरे दिमाग़ के बहुत अंदर किसी जगह पर जैसे अलफ़ाज़ थर्रा रहे थे. 'नाक़ाबिले माफ़ी को भी माफ़ कर दिया जाए.'" 

इस ख़त के बाद से, डॉक्टर साहब, ये कहता है कि इसे मर जाना चाहिए, कि इसे फाँसी दी जाए -- फाँसी।" 
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This post has the following Web-links in the order of occurrence.

1. http://www.humsub.com.pk/122461/shershah-syed/

2. https://en.wikipedia.org/wiki/Shershah_Syed

3. http://pnfwh.org.pk/about-us/

4. https://www.dawn.com/news/1298369

5. https://tribune.com.pk/story/1632537/6-more-and-more-muslims/

6. https://dailytimes.com.pk/116289/forced-conversions-of-pakistani-hindu-girls/
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Tuesday, April 3, 2018

It's complementarity -- not equality -- that is the basis of all human relationships

I liked a very thoughtful talk Pratiksha delivered in Hindi on the subject of disadvantages men and women suffer for being men and women in her video-blog on Lallantop, and posted the following comment addressing Pratiksha.

You've been courageous and candid in your expression, Pratiksha.

So thanks for that.

And special thanks for relying on that primordial human emotion 'love' which can heal all wounds there are, and bridge all differences there can be.

There are, however, less thought out threads in your view.

Calling men a 'quam' is cringe-worthy because all men are women, just as all women are men.

My mother, my sister, my cousins, and all other women close to me are inside me. They are part of me.

I like the view that Gulab Kothari has disseminated through his writings, namely that the
difference is only in the degree of non-material elements: 'som' and 'agni'.

Men tend to have more 'agni' and less 'som', just as women have more 'som' and less 'agni'.

So a man and a woman complement each other.

'Complement' is the operative word.

Guess what? The basis of all human relationships is 'complementarity' -- not 'equality'.

In all our relationships, we 'complement' each other --- and not 'equal' each other.

None of us is 'equal' or can be 'equal' to any other human being.

'Equality' is, in my view, a meaningless concept. Why on earth would I want to be 'equal' to any other person? What does it mean to be 'equal'?

Another less thought out thread in your talk is to posit an ultimate culprit called 'society' and seek to hang everything on this peg called 'society'.

But aren't you 'society' too?

And I?

Isn't your sister or brother society? And your cousin or friend or colleague?

Each one of us is society. So who are we blaming for what each of us is?

I believe we need to have a clearer understanding of primordial human community and culture -- which has continued to exist among us although it seems to have been fast eroding -- and how it reconciled all differences without taking this fraudulent view of men and women as two opposite poles.

A lot of our imagined "problems' has to do with fraudulent concepts introduced by a fraudulent domain called 'political'.

A cohesive human community and culture has the capacity to reconcile all differences and allow every member to have a fulfilling life.

So the key is not to engage in the wild goose chase after fraudulent or meaningless concepts like 'equality', but to appreciate the value of human community and culture -- and seek to set right whatever fault we find in our community and culture.
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This post contains the following Web-links.

1. https://www.youtube.com/watch?v=cJxKLtYu_hY
(पुरुषों, आज एक औरत तुम सबको Thank you कहना चाहती है.  The Lallantop; published on 02 April 2018)

2. https://en.oxforddictionaries.com/definition/complementarity
(Definition of 'complementarity' in online Oxford English dictionary: A relationship or situation in which two or more different things improve or emphasize each other's qualities.
‘a culture based on the complementarity of men and women’)

Sunday, March 25, 2018

"भगत सिंह जैसे हमारे असल नायकों को हमसे छीन लिया गया और उनकी जगह विदेशी लड़ाकू थोप दिए गए," कहती हैं पाकिस्तानी लेखिका

पाकिस्तानियों को आज़ादी दिलाने वाले असल नायकों को उनसे छीन लिया गया है और उनकी जगह विदेशी जंगजूओं को हीरो बना कर थोप दिया गया है.

ये कहना है पाकिस्तानी लेखिका फ़रह लोधी खान का जो कि उर्दू ऑनलाइन पत्रिका 'हम सब' की एक स्तंभकार हैं.

फ़रह कहती हैं, मेरे हीरो भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और वे सारे नौजवान हैं जिन्होंने हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए अपना खून बहाया. ये नौजवान केवल भारत के ही नहीं बल्कि हमारे भी हीरो हैं.

भगत सिंह की बरसी (23 मार्च 2018) पर प्रकाशित अपने लेख में फ़रह कहती हैं कि पाकिस्तानियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया गया है. उनसे मज़हब की झूठी बुनियादों पर उनके असली हीरो और "धरती के रखवाले" छीन लिए गए. उन्हें कभी बताया ही नहीं गया कि उनपर वास्तव में एहसान करने वाले कौन थे.

पाकिस्तानियों की सोच को मज़हब और पंथ की सरहदों में क़ैद कर दिया गया और विदेशी आक्रमणकारियों को उन का हीरो बना दिया गया.

फ़रह एक ब्लॉग भी लिखती हैं. उनका ट्विट्टर आई डी @farah_lodhi है.

पेश है फ़रह का भगत सिंह पर लिखा उर्दू लेख जिसका मैंने हिंदी में अनुवाद किया है. 
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आज़ादी के हीरो भगत सिंह की बरसी

फरह लोधी खान - ‘हम सब’ मैगज़ीन (पाकिस्तान), 23 मार्च 2018

23 मार्च 1931 को लाहौर के मौजूदा शादमान चौक पर तीन व्यक्तियों को आज़ादी की जदोजहद के जुर्म में फांसी की सज़ा दी गई. वो तीन व्यक्ति जो हमारी आज़ादी के हीरो थे उन के नाम थे भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव.

हमारी बदकिस्मती है कि हमें सोमनाथ के मंदिर तो पढ़ा दिए, इस्लाम की जंगें जीतने वालों के बारे में तो बता दिया, मगर हमारे अपने हीरो हम से छीन लिए गए. सिर्फ़ 86 साल में हम ने भुला दिया कि हमारी आज़ादी की बुनियादों में जो खून डाला गया उस का रंग सिर्फ एक था: लाल.

उस खून का कोई मज़हब या पंथ नहीं था.

वो आज़ादी जिस का श्रेय हम सब सिर्फ अपनी अपनी पसंद के लोगों और अपने अपने समुदाय के बुजुर्गों को देते हैं, इस में एक बहुत बड़ी कुर्बानी उस बहादुर नौजवान की भी थी जिस का नाम था भगत सिंह.

जिस उम्र में आज के बच्चे स्मार्ट-फ़ोन पे या तो शदीद नफ़रत या फिर शदीद मुहब्बत को ढूंढते हैं, ये लड़का वो तरीक़े दुनिया को सिखा रहा था जिस से उस की धरती को गुलामी और तिरस्कार से मुक्ति मिल जाए.

23 मार्च 1931 को वो सिर्फ 23 साल का था मगर साम्राज्य के लिए एक असहनीय ख़तरा बन चुका था.

प्रस्ताव, आन्दोलन, और जश्न सब बहुत बाद में संभव हो पाए; समझबूझ और (स्वाधीनता की) मांग ऐसे बहुत से बलिदानों के बाद संभव हुई जब भगत सिंह और उस जैसे बहुत से लड़कों ने अपनी जान दे कर साम्राज्य को झिंझोड़ा.

आज़ादी उस के लिए एक सपना नहीं थी; आज़ादी उस का जूनून, उस के जीवन का उद्देश्य और उसी के शब्दों में उस की दुल्हन थी.

वो सिर्फ भारत का नहीं पाकिस्तान का भी हीरो है क्योंकि वो हिन्दोस्तान की आज़ादी का हीरो है.

लाहौर जहां उसे फांसी दी गई, वहाँ उस की यादगार न जाने कब बन पाए क्योंकि उस का तालुक़ हमारे मज़हब से नहीं था. अगर उस ने भी ये सोचा होता तो वो केवल सिखों की आज़ादी के लिए लड़ता. वो तो हिन्दुस्तान के लिए मर चला.

मेरा हीरो भगत सिंह और मुझे कोई संकोच नहीं कि मेरे हीरो की फेहरिस्त में एक सिख क्यों है?

क्योंकि आज हम सब जिस आज़ादी को महज़ जश्न और नाच-गाने की नज़र करते हैं, उस ने अपनी ज़िंदगी उस आज़ादी को दी.

हमारे साथ बड़ा अन्याय हुआ. हम से हमारे हीरो छीन लिए गए. हमें बताया ही न गया कि हम पर उपकार करने वाले कौन कौन हैं.

ख़ुद भगत सिंह का कहना था कि मैं एक इंसान हूँ और हर वो चीज़ जिस से इंसानियत को फ़र्क पड़ता है उस से मुझे फ़र्क पड़ता है.

वो इंसान था इसलिए वो क़ैद में भी आज़ाद था. हम सोच के क़ैदी आज़ाद हो कर भी क़ैद में हैं.

लाहौर हाईकोर्ट में शहीद भगत सिंह फाउंडेशन की तरफ से एक अपील लम्बित है जिसमें शादमान चौक को भगत सिंह के नाम पर रखने की मांग की गई है.

मगर चुनाव से थोड़ा पहले ज़िंदा हो जाने वाले मज़हब के दुकानदारों को इस से कुछ ख़तरा मालूम होता है और वो ऐसे किसी भी क़दम के विरोधी हैं. मगर हाँ भारत में गाय सम्बन्धी कोई भी घटना घट जाए तो विरोध प्रदर्शन यहाँ होता है.

ये और बात कि वहाँ अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का नाम आज भी वही है; यहाँ कोई भगत सिंह यूनिवर्सिटी न बन सकी.

ये दरअसल सोच का फ़र्क है. हमारा यकीन है कि वो काफिर कोई नेकी नहीं कर सकते जबकि हम पैदाइशी मुसलमान खुद को जन्नत का अधिकारी बताते हैं; इस लिए बड़े गर्व से ग़लत काम करते हैं.

यहाँ लोग अपनी गाड़ी साफ़ रखने की लिए बाहर सड़क को गंदा रखते हैं. किसी के घर जाने का मक़सद अपनाइयत नहीं बल्कि जासूसी होता है. यहाँ लड़के के जवान होने को गर्व से और लडकी के जवान होने को चिंता की दृष्टी से देखा जाता है.

यहाँ किसी बीमार का हाल पूछने जाना भी केवल बदले या एहसान के लिए होता है. यहाँ 16-साल लम्बी शिक्षा सिर्फ़ डिग्री हासिल करने के लिए होती है, विवेक का विस्तार करने के लिए नहीं और यहाँ खुदा, नबी और विश्वास के नाम पर निजी फ़ायदों की दुकान लगती है.

मगर मेरा दुर्भाग्य है कि मुझ से मेरे हीरो छीन लिए गए. मेरे साहित्यकार और कवि विवादों के शिकार बना दिए गए.

मेरी धरती के असल रखवाले और उसकी रक्षा करने वाले मज़हब और पंथ की लकीर खेंच कर हम से दूर कर दिए गए और बाहर से ला-ला कर जंगजू हमारे हीरो बना कर थोप दिए गए.

ये वास्तव में अन्याय है.

अँधेरी रात है कि हम पर एहसान करने वाले सभी विवादों के शिकार हैं. हमें एक दायरे में लाकर छोड़ दिया गया है और हम घूमे जा रहे हैं और पूछे जा रहे हैं कि सफ़र कब ख़त्म होगा? मंजिल कब आयेगी?

वाक़ई अन्धेरा ही अन्धेरा है.
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इस पोस्ट में निम्नलिखित वेब-लिंक्स शामिल किये गए हैं.

1. http://www.humsub.com.pk/author/farrah-lodhi-khan/

2. http://www.humsub.com.pk/117494/farah-lodhi-khan-19/

3. https://farahlodhi.wordpress.com/

'Bhagat Singh My Hero: Our real heroes were taken away and foreign warmongers imposed on us,' says Pakistani writer

While real protectors of our 'dharti' were taken away from us by drawing borders of religion and sect, warmongers imported from outside were foisted upon us as our heroes, says Pakistani writer Farah Lodhi Khan in an Urdu article published on 23 March 2018 .

Her real hero is Bhagat Singh and all those young men who prepared the ground for Hindostan's freedom with their blood, writes Farah in the article that was published in online magazine 'Hum Sub' (हम सब) on the occasion of death anniversary of the great freedom fighter. 
  
Pakistanis have been done a great injustice in that their real heroes and benefactors like Bhagat Singh have been snatched away from them, she says.

"And in place of our real protectors and defenders, invaders and warmongers imported from foreign lands have been imposed on us as our heroes and benefactors."

Farah Lodhi Khan is a pretty regular columnist for Humsub.com.pk. She also has a blog site where her latest post is dated August 2016. 

Her Twitter ID is @farah_lodhi.

The following is the English translation that I've done of Farah's Urdu article on Bhagat Singh.
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Hero of Freedom Struggle Bhagat Singh’s Death Anniversary

By Farah Lodhi Khan
(23 March 2018, ‘Hum Sab’ magazine, Pakistan)

Three individuals were put to death by hanging for waging war of independence at what is now Shadman Chowk of Lahore on 23 March 1931.

These three individuals were the heroes of our freedom struggle and their names were Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev.

It has been our misfortune that whilst we were taught about Somnath temple and told about the conquerors of Babel of Islam, our very own heroes were snatched away from us.

In just 86 years, we have completely forgotten that there was only one colour of the blood that was poured into the foundations of our freedom and that was red.

That blood had no religion, creed, or sect.

One of the immense sacrifices that gave us our freedom -- whose credit we like to give only our favourite people and the elders of our own social group -- was made by a brave young man whose name was Bhagat Singh.

At an age that today’s children spend finding intense love or loathing on their smart-phones, this boy was showing the world how to liberate one’s land from servitude and indignity.

On 23 March 1931, he was only 23 years old and was already a mortal threat to the Empire.

Resolutions, movements and celebrations became possible only much later; understanding of and demand for freedom came only after Bhagat Singh and other young men of his kind had shaken up the Empire by sacrificing their lives.

For him freedom was not a dream; freedom was his obsession, the mission of his life, and, in his words, his beloved bride.

He is not only Bharat’s but also Pakistan’s hero because he is the hero of Hindostan’s freedom struggle.

He did not belong to our religion; so nobody knows when, if at all, his memorial will be built at the place in Lahore where he was hanged.

If he too had thought like that, he would have fought only for the freedom of Sikhs.

But he died for Hindostan.

So my hero is Bhagat Singh and why I am not embarrassed in admitting that a Sikh figures in my list of heroes?

Because the freedom that we spend today in song and dance and looking for ways to have fun, that freedom he gave his life to.

We’ve been done a terrible injustice – our heroes have been snatched away from us!

We were never told who our real benefactors are.

Bhagat Singh himself said, ‘I am human and everything that affects humanity affects me’.

He was human and so he was free even while in captivity.

We, the captives of our thinking, are unfree despite the freedom we have.

An appeal pending decision and filed by Shaheed Bhagat Singh Foundation at the Lahore High Court seeks re-naming of Lahore’s Shadman Chowk after Bhagat Singh, but peddlers of religion who usually set up their stalls just before elections feel threatened.

They are dead set against any such measure.

And yet even a small cow-related incident in Bharat elicits protests in this country.

It’s a different matter that while Aligarh University continues to be Aligarh University there, no
Bhagat Singh University ever came up here.

It’s actually all a difference in the way we think.

We like to believe that while those Kafirs cannot do any good, we Muslims have a birthright over
Jannat and so we take pride in doing wrong.

Here people litter the roads in order to keep their cars clean and visit others’ homes not for sociality but to spy on them.

Here a boy’s adulthood is greeted with pride and a girl’s coming of age is a cause for concern. Here even a visit to a sickbed is made in exchange for a similar visit or as a favour.

Here a 16-year education is pursued merely for a degree, not for broadening one’s mind.

Here selfish interests regularly set up shop in the name of God, prophet, and faith.

But I have been wronged in having my heroes snatched away from me and my poets and writers pushed into shadow of controversy and dispute.

While the real protectors and defenders of my ‘dharti’ were taken away from us by drawing borders of religion and sect, warmongers imported from outside were foisted upon us as our heroes and benefactors.

This really is an injustice – a dark night in which all our benefactors are disputed.

We have been confined in a circle and made to go round and round, asking each other when this journey will end, when we will reach our destination.

There really is darkness and only darkness.
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The following Web-links have been used in this post.

1. http://www.humsub.com.pk/117494/farah-lodhi-khan-19/

2. http://www.humsub.com.pk/author/farrah-lodhi-khan/

3. https://farahlodhi.wordpress.com/



Thursday, March 22, 2018

Manmohan Singh's PHFI unravels under its own fraud and criminality: "Half dead, in critical care"

Manmohan Singh's "world class" Public Health Foundation of India (PHFI) that was to teach "public health" to the whole of India has actually unraveled like the plot of a B-grade Bollywood movie, as I'd suggested in this Moneylife article as far back as September 2012.

A Health Ministry official told me on Tuesday that "we have had no links with PHFI" (contrary to PHFI's 12-year-old claim that Health Secretary sits on its board and it is some kind of 'PPP') and that PHFI is "already half-dead and in critical care, although some people are pleading with the government to save it".

The Health Ministry has also asked PHFI to respond to my complaint (highlighting cover-up of a scam of Rs100 crore and other instances of criminal conduct) within 10 days of receipt of a notice dated 16 March 2018.

All relevant arms of the government have officially confirmed through RTI that no order was ever issued allowing Health Secretary and other top government officials to be on the PHFI governing board. 

So PHFI governing board has been a fraud right from 2006 when this sneaky private club was registered as society by McKinsey's Rajat Gupta, K. Srinath Reddy and six other frontmen and hirelings!

(Mail me at bajajk74@gmail.com for all RTI requests and responses sent by Health Ministry, the PMO, and the Department of Science and Technology. You can also take a look at a few screenshots of these RTI inquiries in this, this, and this tweet of mine.) 

I have already shown in the article linked above as well as this one that PHFI was NEITHER a 'Public-Private Partnership', NOR an 'autonomous body' under any ministry of the central government, NOR did it ever have any other legally tenable status as a public service entity.

I have also shown that Rs 65 crore grant that Prime Minister Manmohan Singh gave a non-entity like PHFI in 2006 was illegal as it fell foul of the General Financial Rules 2005.

Manmohan Singh and his ministers employed falsehood and fraud in Parliament and outside to insinuate PHFI into government, creating enduring conditions for wide-spread corruption and perversion of norms of public service. 

So PHFI is entirely fraudulent in its conception, registration, formation, area of work/influence, and in its continued existence. 

And PHFI has proven that time and again. 

I showed in 16 Feb. article that PHFI Chairman N.R. Narayana Murthy and President K. Srinath Reddy have hushed up a Rs 100 crore swindle that has wiped out the Rs 65 crore government grant -- without incurring any consequences of this criminal conduct.

Sources have been informing me about more instances of corruption and criminality in PHFI, such as about 100 acre land grab across the country.

I'll be detailing those instances of corruption and criminality in my forthcoming writings.

Friday, March 9, 2018

Here's a media report that names PHFI as having lost money to a fixed deposit scam

After searching long and hard, I did manage to find on 08 March 2018 one media report that names Public Health Foundation of India (PHFI) as having lost money to a fixed deposit scam.

It’s a Times of India report, filed by reporter Mateen Hafeez and published on 07 Sep. 2014, which I have pasted at the bottom of this post along with its Web-link.

The report says that PHFI lost Rs 82 crore to a “cash credit scam” involving the lure of big “returns on fixed deposits and later withdrawal of money through cash-credit using these FDs”.

According to my sources, PHFI lost “more than Rs 100 crore” to the scam. That’s what I said in my article published on this site on 16 Feb. 2018.

I stand by that.

According to the latest information I’ve gathered from my sources, PHFI lost Rs 108 crore to a fixed deposit swindle in the year 2013-14, which was more than half of fund corpus.

That left only about Rs 100 crore of fund corpus out of which about Rs 20 crore was frozen as security, sources said.

Manmohan Singh government had in 2006 (i.e. the year PHFI was set up) contributed Rs 65 crore to PHFI fund corpus to be primarily used for setting up two public health schools.

That grant has been wiped out, which means PHFI now has hardly any money to build upon large pieces of land acquired in states, sources said.

"PHFI is currently sitting on about 160 acres of land, acquired from state governments for free, most of which is lying vacant. It has no wherewithal to build on that land. So it's nothing short of land grab,” my sources told me.

Now that I have found one media report that refers to PHFI in connection with the fixed deposit scam, the statement I included in my 16 Feb. article that "no media organisation has written or shown anything that will name PHFI in connection with the scam" stands amended.

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https://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Mumbai-economic-offences-wing-files-four-chargesheets-in-fraud-cases/articleshow/41962416.cms?from=mdr

Mumbai economic offences wing files four chargesheets in fraud cases

Mateen Hafeez | TNN | Updated: Sep 7, 2014, 21:08 IST

MUMBAI: A 35-year-old MBA, who claimed to be a financial consultant, was charged for his alleged role in the cash-credit scam two days ago.

The economic offences wing (EOW) of the city police filed four separate chargesheets against the accused, Anil Pawar, where the accused along with his associates had duped the south Indian education society (SIES) of Rs 38 crore.

Pawar, who stayed in a chawl at Tardeo, had approached the SIES authorities claiming to be a financial consultant and stated that he had strong connection in some nationalized banks.

“If you invest money in fixed deposits in certain banks, you will get one per cent more interest due to my connection. Besides this, we are running a company which will get commission and from this we will give you one more per cent on your total investment,” Pawar reportedly told SIES authorities.

SIES, in the four FIR, has mentioned cheating amount up to Rs 38 crore. The accused forged papers and on the SIES FDs, they availed the cash credit facility.

The fifth FIR, filed by the SIES, is currently under probe.

“He worked as a senior manager with a Financial Information Source firm before being sacked due to some internal problems. Even after he was sacked, he would use the business card of this firm,” said the investigating officer.

His three associates, Mohammed Fasih, chairman and managing director of the Showman Group that runs the countrywide Sheesha lounge chain, Avinash Khandale and Roy Josesph will be charged next week, said police.

The EOW registered nine criminal cases against the accused. It is currently probing seven more complaints (cheating amount Rs 101 crore) against them for targeting various private and government institutions by luring them huge returns on fixed deposits and later withdrawing money through cash-credit using these FDs.

In all the nine FIRs, the accused are suspected to have cheated several institutions of Rs 227.38 crore. Besides this the latest seven enquiries are looking into cheating of Rs 101.5 crore.

All the four accused currently in the Arthur Road jail while the police have issued look out circular notices against five accused to all the airports in the country.

The police are probing the cash-credit fraud and how the money went to Fasih’s company accounts using the affected FDs.

The latest complainants are Mahalaxi trust (Rs three crore cheating case), Public Health Foundation of India (three separate complaints of collective cheating amount Rs 82 crore), Akhil Bharat Varshiya Marvadi Jatiye Kosh (Rs 8.5 crore), M/s Market Place Technology pvt Ltd., (Rs three crore) and Ayurved Prachar Sanstha (Rs five crore). The investigation of Mahalaxi temple trust has been entrusted to the Gamdevi police station.

Police probe found that the loans availed on SIES FDs were diverted to Bhairav Trading, Yashraj Enterprises, Shivam Trading, Darshan Sales, Lovely Fabrics, etc, and after a series of transfers ended up in Showman Group's bank accounts.

Fasih, also a Bollywood producer, after spending 15 days was sent to the Arthur Road along with his cronies. So far, 50 bank accounts belonging to Fasih, his company and cronies have been frozen that contain Rs 5.5 crore.
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This post contains the following Web-links.

1. https://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Mumbai-economic-offences-wing-files-four-chargesheets-in-fraud-cases/articleshow/41962416.cms?from=mdr

2. https://kbforyou.blogspot.in/2018/02/phfis-rs-100-crore-scam-and-ensnaring.html

Friday, February 16, 2018

PHFI’s Rs 100 crore scam and ensnaring of Sree Chitra Tirunal Institute in a corrupt deal: impostors’ club hurtles from fraud to fraud (UPDATED)

By Kapil Bajaj

Twelve years after it was fraudulently implanted into government by Prime Minister Manmohan Singh, Public Health Foundation of India (PHFI) continues to engage in corruption, fraud and criminality to fulfill its illegitimate objectives and to cover its tracks.

(Having received more information from my sources after the publication of this article, I have updated this article on 15-16 March 2018. Updates are additional information inserted at appropriate places in brackets and without italics. Apart from these insertions and a few more Web-links, the original text remains unchanged.).

I received a call in November 2017 from someone – let’s call her/him Source One – who worked for PHFI at a senior position for a long time until she/he had had enough of the skulduggery that she/he witnessed there and resigned.

Source One told me there has been a scam amounting to more than Rs 100 crore in PHFI, wiping out the entire government contribution of Rs 65 crore to the ‘initial fund corpus’, which has been suppressed by president K. Srinath Reddy and his henchmen.

("PHFI lost Rs 108 crore to a fixed deposit swindle in the year 2013-14, which was more than half of its fund corpus.

That left only about Rs 100 crore of fund corpus out of which about Rs 20 crore has been frozen as security," sources said.

In 2006, Prime Minister Manmohan Singh had personally promoted PHFI and had the government contribute Rs 65 crore to the fund corpus of PHFI to be primarily used for building two public health school campuses.

"That grant has been wiped out, which means PHFI now has no money to build upon large pieces of land acquired in states.")

PHFI has redacted its publicly available reports in order to hide the swindle which took place through collusion between scamsters within PHFI and those claiming to represent Dena Bank and Oriental Bank of Commerce (OBC), Source One said.

("Large portions of publicly available annual reports were obscured, in order to hide the theft of funds." sources said.

Despite its claim that Union Health Secretary and other top government officials sit on its governing board, PHFI has never made public the minutes of its board meetings, not even after it was ordered in February 2012 by the central information commission or CIC to be RTI-compliant.)

No media organisation has written or shown anything that will name PHFI in connection with the scam which (according to media reports) is being investigated by the Central Bureau of Investigation (CBI). Not a word.

(A Times of India report of 07 Sep. 2014 does name PHFI as having been cheated of Rs 82 crore crore through a “cash credit scam” involving the lure of big “returns on fixed deposits and later withdrawal of money through cash-credit using these FDs”.)

Head-Finance Amit Chaturvedi, who is directly answerable for the stolen funds, continues to be on the payroll of PHFI while propriety demands he should have been the first to quit or be asked to step down, Source One said.

“Absolutely no one in PHFI has been held to account for the massive fraud even though, as far as I can understand, there is criminal culpability of the people on whose watch the funds were siphoned off – including that of Srinath Reddy.”

("Asked why hasn't Head-Finance been fired, Reddy said: 'If we let go of him, that would be held as proof of wrongdoing on our part'.")

Source One said the swindle and the cover-up took place during the chairmanship of N.R. Narayana Murthy – who has since Jan. 2015 been enjoying his second stint as the chair of the corrupt private club, the first being July 2011-Oct. 2013 – showing what hypocrisy the Infosys man embodies in projecting himself as an advocate of high standards of "corporate governance".

Bill and Melinda Gates Foundation (BMGF) – which led the gang of capitalist racketeers in setting up PHFI (which should most appropriately stand for 'Public Health Fraud of India') in 2006 – has washed its hands off the whole episode and government representatives on the PHFI board have predictably been supine.

Plots of land acquired in states for setting up public health schools haven't been built upon, which is another big scam, Source One said.

("PHFI is currently sitting on about 160 acres of land, acquired from state governments for free, most of which is lying vacant. It has no wherewithal to build on that land. So it's nothing short of land grab," sources said.

"Only Gandhinagar campus has been built with state government assistance. In Hyderabad over 40 acres of land is lying vacant. Public health schools in Hyderabad, Delhi-NCR, and Shillong are running on rented properties.

In Shillong, the state government has taken back the land earlier given," sources said.)

“All the bungling and mismanagement has caused a haemorrhage of workers, shrinking PHFI from a 1000-plus organisation to about half that strength," Source One said.

("A large number of key people have left PHFI. There's anyway little money to retain talent. Some senior people have gone without salary for the last three months. Almost everyone is now on 10-20 per cent contract, which means one gets paid only for 10-20 per cent of the time they would have worked had they been working full time.")

Meanwhile, K. Srinath Reddy, the criminal-minded president of PHFI who, in August 2012, forged a document (purportedly a copy of the signed and stamped document setting out the composition of PHFI governing body as on 31 March 2006.) and had it sent to me under the Right to Information (RTI) Act, continues to enrich himself, drawing a pay package of about Rs one crore per annum.

(Reddy the crook has indeed come a long way since the time he worked as a cardiologist at New Delhi's All India Institute of Medical Sciences or AIIMS on a modest salary. 

While working at AIIMS-New Delhi, he wangled himself a wholly illegal “deputation” to PHFI, the impostors’ club that he himself helped to register as society along with Rajat Gupta of McKinsey and six other wheeler-dealers and hirelings. 

His is thus a Jeffery Archeresque tale of how a humble but scoundrelly public official helped carve a parasitical private empire inside government and manoeuvred himself into the position of its fabulously-paid steward.

Reddy pulled that off by hitching his wagon to a ‘star’ which in his case was Rajat Gupta, the suave henchman in India of American corporate interests and a favourite crony of Prime Minister Manmohan Singh’s. 

Gupta became the founding chairman of PHFI and made Reddy the chief executive, but had to give up his position after falling foul of the law in the US.

Gupta was found to be involved in the Galleon insider trading ring; he was later to be prosecuted for and convicted of securities fraud in that case and jailed for two years.)

(Srinath Reddy has turned out to be much more than what I thought of him all along, i.e. somebody who rose primarily by hitching his wagon to 'star' Rajat Gupta.

I learnt recently that he is the son of K.V. Raghunatha Reddy, a Congress politician (1924-2002) who was minister in Indira Gandhi government, served three terms as member of Rajya Sabha, and served in the 1990s as Governor of Tripura, West Bengal, and Odisha.

It also turns out that Srinath Reddy was not just doctor to Prime Minister Manmohan Singh as I had pointed out in my 13 March 2011 article, but also to Prime Minister P.V. Narasimha Rao.)

Source One told me that the aforementioned swindle took place when PHFI dealt with middlemen of Dena Bank and Oriental Bank of Commerce (OBC) in transferring money into fixed deposits (FDs).

("Funds were transferred to FDs with mere Reddy's authorization, even though in any well governed organization with checks and balances that would have been the job of a committee of the governing board.")

“Fake FD receipts were issued to PHFI and the money was diverted to the third parties.”

The media reported in August 2014 that “the finance ministry has ordered a forensic audit of Dena Bank and OBC after some of their Mumbai-based branches allegedly misappropriated funds worth Rs 437 crore, mobilized through fixed deposits”.

“The CBI is already looking into the alleged fraud,” said a report by the Hindu-Business Line.

The media gave wide coverage in 2017 to the home ministry’s revoking of PHFI’s licence to receive foreign funds without saying anything about money swindled through FDs at Dena Bank and OBC.

PHFI’s licence to receive foreign funds was revoked, according to media reports, on account of a number of "undesirable activities", including failure to declare over 100 FDs and “having more than one PAN (permanent account number) for opening accounts and FDs” in violation of the law.

I checked on PHFI’s website its annual reports (two of which, for the years 2012-13 and 2013-14, are available) and found large portions blurred and rendered unreadable.

These portions contain information such as sources of funds, application of funds and bank deposits.

It’s notable that despite allowing PHFI to scrounge off public assets worth hundreds of crores, the government continues not to force this racket to submit itself to audit by Comptroller and Auditor General of India (CAG).

(Sources said: "In 12 years of PHFI's existence, the same governing board has continued with small changes.

"Government representatives on the PHFI board don't attend board meetings. The very claim that they are members of the PHFI board is a mystery. PHFI needs to be asked by what authority it is allowed to say that government officials are on its board."

"Lack of accountability has not only run PHFI into ground, but Narayana Murthy and Srinath Reddy and his team have damaged the cause of public health in India."

"They have taken us 15 years back. The betrayal of trust means building a good public health institution in India will now be exceedingly difficult.")

Ensnaring Sree Chitra Tirunal Institute
Continuing with its criminal ways, PHFI manipulated Sree Chitra Tirunal Institute for Medical Sciences and Technology (SCTIMST) at Trivandrum into wrongly recognizing the former’s dubious ‘Master of Public Health’ (MPH) and PhD programmes.

The SCTIMST has been recognized by the central government as a university and an institute of national importance.

“An entirely corrupt and unlawful arrangement was reached after SCTIMST’s academic committee and governing body repeatedly refused PHFI’s request for affiliation, citing serious problems,” said another source – let’s call her/him Source Two – who contacted me this month (February 2018).

The change of direction came about with new SCTIMST director Asha Kishore taking office on 15 July 2015.

“She brings the matter again in the academic committee (on 31 Oct. 2015) on the basis of a letter (dated 05 Oct. 2015) from PHFI’s Srinath Reddy re-seeking “strategic partnership” and a discreetly encouraging email from Secretary of the Department of Science and Technology (DST),” said Source Two who has long worked for SCTIMST.

(Making a pitch for recognition of PHFI’s courses by DST Secretary Ashutosh Sharma is another illustration of how the impostors’ club has honeycombed the government, so that it’s hard to say who a babu works for. 

In addition to being the top bureaucrat at DST, which happens to be the department supervising SCTIMST, Sharma also sits on PHFI’s general body! 

No point looking for conflict of interest here! Rather appreciate the sublime convenience of imposture, like the numinosity of a many-faced god!)

(Within days of publication of this article and coverage of PHFI-SCTIMST deal by Open magazine, Deccan Herald, The News Minute, and other media outlets, including the dubious role played by DST Secretary Ashutosh Sharma, PHFI quietly dropped Sharma from its general body!

PHFI website showed that Sharma was dropped from general body on 01 March 2018.

Neither PHFI, nor Sharma, nor the government is answering the question posed by me and other journalists as to whether Sharma's removal from PHFI general body is an admission of wrongdoing exposed by the media.

PHFI, Sharma, and the government are also silent as to who authorized DST Secretary's membership of PHFI general body in the first place.

Where's the order that allowed him to be on PHFI board and start using his DST secretaryship as a hired agency of this impostors' club?

It's almost certain that PHFI approached Sharma in order to use him for striking the illegal deal with SCTIMST and 'hired' him on its board in "private capacity".

Mohit Abraham, a legal counsel of PHFI, explained this "private capacity" membership of PHFI to Central Information Commissioner Shailesh Gandhi in 2012 in a hearing that I attended on behalf of the RTI applicant, saying: "Montek Singh Ahluwalia is on PHFI board not as deputy chair of Planning Commission, but as Montek Singh Ahluwalia."

Needless to say it shocked the Information Commissioner Gandhi who observed that this "private capacity" business could be nothing but a "slur" on the integrity of a public servant.

Read the CIC's observation in his order dated 14 Feb. 2012, whose Web-link is pasted at No. 3 in this article's references.

I checked PHFI's rules and regulations to learn that DST Secretary's post is not listed among those government posts that get membership of PHFI general body in "ex officio" capacity -- even though there is no evidence of any government authorization for even the 'ex officio'  membership of PHFI general body.

That means DST Secretary Ashutosh Sharma was in PHFI general body in "private capacity" -- a clear case of corruption and abuse of public office.)

“The matter was smuggled into the academic committee as an out of agenda item without a word of justification. So Asha Kishore (SCTIMST director) managed to circumvent the requirement to circulate an item at least seven days before the meeting,” said Source Two.

“The SCTIMST’s academic committee then accepts PHFI’s request on the basis of falsehoods that are uttered in the meeting, such as the statement that ‘PHFI is already partner for some of SCTIMST’s projects’. I drew a blank when I asked SCTIMST for documents that would support that statement,” Source Two said.

Subsequently, the SCTIMST governing body (chaired by former Union Cabinet Secretary K.M. Chandrasekhar), which had earlier taken on board serious problems in affiliating PHFI, accepts the recommendation without discussion and with a single, clumsily scribbled sentence that neither cites the course title nor names the PHFI institute to be granted the favour.

“It’s transparent that the match was fixed,” said Source Two.

“Srinath Reddy’s letter says he spoke with K.R. Thankappan, who headed SCTIMST’s public health school and favoured the affiliation. Asha Kishore tables a ‘note’ from Thankappan supporting affiliation and allows V. Ramankutty (of the same school) to make false statements like ‘PHFI is already partner for some of SCTIMST’s projects’.”

The inclusion of PhD programme in the arrangement that SCTIMST and PHFI entered into on 28 December 2015 is no less than daylight robbery, considering that PhD was not only not discussed in the academic committee meeting, it was not even mentioned in the letter that Srinath Reddy the crook wrote on 05 October 2015 to SCTIMST director Asha Kishore.

That’s not all.

The SCTIMST accommodated PHFI by changing eligibility conditions for MPH, allowing engineering, management and law graduates also to apply for the course.

(This change was also effected quite dubiously. While there is an SCTIMST notification of 02 Sep. 2016, citing a decision made by the academic committee and endorsed by the governing body, which adds engineering graduates to the candidates eligible to be admitted to MPH, there is nothing in the public domain that accounts for the inclusion of management and law graduates.)

Earlier, the SCTIMST allowed into its MPH course people with qualifications in medicine and allied sciences, or at most those holding post graduate degrees in social sciences or nutrition.

In fact, a Gazette of India notification of 22 Dec. 2011 deems SCTIMST’s MPH to be a “medical degree awarded to those persons holding recognized medical qualifications under the Medical Council of India Act, 1956”.

So the change made to accommodate PHFI goes against this gazette notification.

“It’s clear that change in eligibility conditions was made to help PHFI bag candidates and make money. PHFI has also been allowed a much greater intake of students and to charge much higher tuition fees,” Source Two told me.

While SCTIMST admits 25 students in its MPH course, PHFI has been allowed to admit 50; as against the former charging tuition fee of Rs 1.10 lakh for whole of the two year course the latter has been allowed to charge Rs 1.80 lakh per year.

After entering the arrangement with PHFI on 28 December 2015, the SCTIMST also relaxed the maximum period in which a student can complete the MPH course from two to three years (and to four years in ‘extraordinary circumstances’ with director’s approval).

There are more signs of a fixed match, such as PHFI’s citing of engineering graduates (as also management and law graduates) among those who are eligible to apply for the MPH course, in a press release issued on 29 January 2016 – long before SCTIMST’s academic committee took a decision to that effect.

The SCTIMST academic committee took a decision to add engineering graduates to the candidates eligible to take the MPH course only on 05 April 2016 (with the governing body endorsing it in July 2016 and the institute notifying the decision in September 2016).

“A complaint against the PHFI-SCTIMST deal was filed in Sep. 2017 with the Lokayukta-Kerala (case No. C/1009/2017) and another complaint has been sent to the CBI. The Kochi branch of the CBI has already been conducting a preliminary inquiry into this matter,” Source Two told me.

That PHFI is a parasitical body created and propped up by suborning government and misappropriating public money is illustrated by a letter dated 10 Jan. 2017 that PHFI’s Sanjay Zodpey wrote to the mission director of National Health Mission-Madhya Pradesh, begging for “few candidates” to be nominated for the MPH course – which won’t be worth anything without a government institute like SCTIMST legitimizing it.

So the impostors’ club faking private-sector competence and efficiency appropriates government’s resources and then begs the same government for being allowed to provide a paid service to the government!

That’s how Manmohan Singh's Public Health Fraud of India (PHFI) has been playing out for the last 12 years!

A law unto itself
To have a perspective on the two scams described above, bear in mind that PHFI was designed as a scheme that would allow its beneficiaries to enjoy power and privilege without any public accountability, as I explained earlier in my articles here, here (four-part series in Moneylife), and here.

(I wrote another important article in Oct.2012 which explains how PHFI is an elaborate fraud enacted by Prime Minister Manmohan Singh and his ministers, and why Manmohan should be prosecuted for that.

Manmohan and his ministers used terms like 'Public-Private Partnership' or ‘PPP’ and ‘autonomous PPP’ to hoodwink the public, the Parliament, and a parliamentary committee about PHFI’s formation, identity, privileges, area of work and influence.)

It is accountable to no one except fraudsters like Bill Gates, N.R. Narayana Murthy and Harpal Singh (of Fortis Healthcare) who use it as a convenient handle on governments in the centre and the states to promote their private interests.

I had shown in my articles that PHFI is neither a ‘public-private partnership (PPP)’ in any formal meaning that the government attaches to that descriptor nor an ‘autonomous body’ under any ministry (nor any recognized hybrid of a ‘PPP’ and an ‘autonomous body’), as the Manmohan Singh government falsely and repeatedly claimed and as this impostors’ club continues to suggest even today.

It’s no surprise that there is no one to take responsibility for the actions of PHFI. Nor is there anyone who will ensure that it faces the consequences of its actions.

So PHFI has been a law unto itself. Over 12 years of its existence, it has been perverting with impunity the norms and processes of the central and state governments and public and private entities that it entraps in corrupt deals.

I believe rackets like PHFI came out of some kind of ‘elite consensus’ or ‘elite connivance’ in India, which means all those in power, whichever political party they belong to, are together in it, even though their stakes may vary --- be it Manmohan Singh of Congress or Narendra Modi of BJP or Naveen Patnaik of Biju Janata Dal (BJD), or even the so called ‘Left’ which has had no problem with it.

So Prime Minister Manmohan Singh “launched”, public-funded, and legitimized this fraud in 2006.

His party colleague Chief Minister Y.S. Rajasekhara Reddy gave PHFI land for setting up its ‘public health school’ in Andhra Pradesh, as did Chief Minister Narendra Modi in Gujarat, and Chief Minister Naveen Patnaik in Odisha.

It has been reported that Gujarat government (post-Narendra Modi) also legislated PHFI’s public health school in Gandhinagar into acquiring ‘university’ status.

While I investigated PHFI back in 2012, I had also learnt that the close family of a Biju Janata Dal (BJD) politician, who has long been the most prominent face of his party in Delhi, might have benefited from setting up PHFI’s public health school in Bhubaneswar – in the land deal, as far as I can remember.

(I understand that this politician's wife is the managing director of a company in which Rajat Gupta’s private equity firm New Silk Route Partners had invested.)

The ‘elite consensus’ has meant that the entire ‘establishment’ (by which I mean people with power – executive, legislative, judicial and media) has ignored this elephant in the room.

It also helps explain why government led by Narendra Modi has not shut down the racket that his predecessor Manmohan Singh set up.

PHFI case also shows that mass ‘media’ organizations are nothing but constituents of a glorified PR/propaganda system, affecting stupid ‘ideologies’ and showing pernicious selectivity in purveying news and commentary.

A self-professed ‘journalism-of-courage’ rag like the Indian Express, for example, has reported about PHFI right from 2006, helping this entity acquire legitimacy, but never asked the basic question: If PHFI claims that it’s a ‘public-private partnership’ (or ‘public-private initiative’) then who is the public authority and who are the private parties in this relationship and where is the agreement that they signed between themselves?

Has anyone seen that agreement? What is written in it? What is its scope and duration? What are the things that the parties to it are supposed to do? And who is responsible for ensuring that the parties adhere to the agreement?

It’s funny to see that in reporting on revocation of PHFI’s FCRA licence, the Indian Express and other rags portrayed PHFI as an “NGO” being victimized by the Narendra Modi government – (presumably in order to feed their favoured narrative that this government has engendered a riot of “right wing” fascism in the country) – but refrained from digging into the alleged hiding of over 100 fixed deposits by PHFI.

A number of people may be liable for the Public Health Fraud of India (PHFI), but I believe if ever the process of accountability starts, four individuals who must first be prosecuted for setting up this racket, in that order, are: Manmohan Singh, Rajat Gupta, K. Srinath Reddy, and Bill Gates.
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The following Web links have been used in this post in their order of occurrence.

1. https://www.thehindubusinessline.com/todays-paper/tp-economy/PM-launches-Public-Health-Foundation/article20203479.ece

2. http://archive.indianexpress.com/news/phfi-gets-rolling-with-grants-from-govt-gates-/9886/

3. http://ciconline.nic.in/cic_decisions/CIC_SG_C_2011_001273_17356_M_76524.pdf

4. https://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Mumbai-economic-offences-wing-files-four-chargesheets-in-fraud-cases/articleshow/41962416.cms?from=mdr

5. http://kbforyou.blogspot.in/2012/09/fraud-at-phfi-and-role-of-chief.html

6. https://www.thehindubusinessline.com/markets/rajat-gupta-gets-2-years-in-jail-for-insider-trading/article23084253.ece

7. https://en.wikipedia.org/wiki/K._V._Raghunatha_Reddy

8. https://www.thehindubusinessline.com/money-and-banking/Finance-Ministry-orders-forensic-audit-on-Dena-Bank-OBC-in-Rs-437-cr-fraud/article20848451.ece

9. https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/mha-order-revoking-license-of-phfi-lists-7-undesirable-activities/articleshow/58294627.cms

10. https://phfi.org/about-us/annual-reports

11. http://www.openthemagazine.com/article/education/a-course-and-a-correction

12. http://kbforyou.blogspot.in/2011/03/manmohan-singhs-public-private.html

13. https://www.moneylife.in/article/will-phfi-be-any-different-under-narayana-murthy/18337.html

14. http://kbforyou.blogspot.in/2012/09/with-phfi-falsification-is-truth.html

15. http://kbforyou.blogspot.in/2014/03/public-health-fraud-of-india-heres-why.html

16. http://pib.nic.in/newsite/erelcontent.aspx?relid=16832

17. http://naveenpatnaik.com/news/Indian-Institute-of-Public-Health-to-come-up-in-Orissa-at-investment-of-Rs-140-crore/170.html

18. http://www.expressbpd.com/healthcare/cover-story-healthcare/iiph-gandhinagar-has-become-the-first-public-health-university-via-gujarat-state-act-passed-in-2015/380717/

19. http://indianexpress.com/article/india/govt-cancels-fcra-licence-of-phfi-top-public-health-ngo-foreign-funds-4620326/




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